(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.194. अध्यायः 194
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति जपफलप्रकारादिकथनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच। 12-194-0x(5966)(72685)
चातुरात्रस्यनुक्तं ते राजधर्मास्तथैव च।
नानाश्रयाश्च भगवन्नितिहासाः पृथग्विधाः॥ 12-194-1(72686)
धुतास्त्वत्तः कथाश्चैव धर्मयुक्ता महामते।
संदेहोऽस्ति तु कश्चिन्मे तद्भवान्वक्तुमर्हति॥ 12-194-2(72687)
जापकानां फलावाप्तिं श्रोतुमिच्छामि भारत।
किं फलं जपतामुक्तं क्व वा तिष्ठन्ति जापकाः॥ 12-194-3(72688)
जपस्य च विधिं कृत्स्नं वक्तुमर्हसि सेऽनघ।
जापका इति किंचैतत्साङ्ख्ययोगक्रियाविधिः॥ 12-194-4(72689)
किं यज्ञविधिरेवैष किमेतज्जप्यमुच्यते।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः॥ 12-194-5(72690)
भीष्म उवाच। 12-194-6x(5967)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
यमस्य यत्पुरा वृत्तं कालस्य ब्राह्मणस्य च॥ 12-194-6(72691)
`इक्ष्वाकोश्चैव मृत्योश्च विवादे धर्मकारणात्।'
संन्यास एव वेदान्ते वर्तते जपनं प्रति।
वेदवादाङ्गनिर्वृत्ताः शान्ता ब्रह्मण्यवस्थिताः॥ 12-194-7(72692)
साङ्ख्ययोगौ तु यावुक्तौ मुनिभिः समदर्शिभिः।
मार्गौ तावप्युभावेतौ संश्रितौ न च संश्रितौ॥ 12-194-8(72693)
यथा संश्रूयते राजन्कारणं चात्र वक्ष्यते।
`क्रमेण चैव विहितो जपयज्ञविधिर्नृप॥ 12-194-9(72694)
सालम्बनमिति ज्ञेयं जपयज्ञात्मकं शुभम्।'
मनः समाधिरेवात्र तथेन्द्रियजयः स्मृतः॥ 12-194-10(72695)
सत्यमग्निपरीचारो विविक्तानां च सेवनम्।
ध्यानं तपो दमः क्षान्तिरनसूया मिताशनम्॥ 12-194-11(72696)
विषयप्रतिसंहारो मितजल्पस्तथा शमः।
एष प्रर्वाको धर्मो निवर्तकमथो शृणु॥ 12-194-12(72697)
यथा निवर्तते धर्मो जपतो ब्रह्मचारिणः।
`न जपो न च वै ध्यानं नेच्छा न द्वेषहर्षणौ।
युज्यते नृपशार्दूल सुसंवेद्यं हि तत्किल॥ 12-194-13(72698)
जपमावर्तयन्नित्यं जपन्वै ब्रह्मचारिकम्।
तदर्थबुद्ध्या संयाति मनसा जापकः परम्॥ 12-194-14(72699)
यथा संश्रूयते जापो येन वै जापको भवेत्।
संहिताप्रणवेनैव सावित्री च परा मता॥ 12-194-15(72700)
यदन्यदुचितं शुद्धं वेदस्मृत्युपपादितम्।'
एतत्सर्वमशेषेण यथोक्तं परिवर्तयेत्॥ 12-194-16(72701)
द्विविदं मार्गमासाद्य व्यक्ताव्यक्तमनामयम्।
कुशोच्चयनिषष्णः सन्कुशहस्तः कुशैः शिख।
कुशैः परिवृतस्तस्मिन्मध्ये छन्नः कुशैस्तथा॥ 12-194-17(72702)
विषयेभ्यो नमस्कुर्याद्विषयान्न च भावयेत्।
साम्यमुत्पाद्य मनसा मनस्येव मनो दधत्॥ 12-194-18(72703)
तद्धिया ध्यायति ब्रह्म जपन्वै संहितां हिताम्।
संन्यस्यत्यथवा तां वै समाधौ पर्यवस्थितः॥ 12-194-19(72704)
ध्यानमुत्पादयत्यत्र संहिताबलसंश्रयात्।
`अथाभिमतमन्त्रेण प्रणवाद्यं जपेत्कृती॥ 12-194-20(72705)
यस्मिन्नेवाभिपतितं मनस्तत्र निवेशयेत्।
समाधौ स हि मन्त्रे तु संहितां वा यथाविधि।'
शुद्धात्मा तपसा दान्तो निवृत्तद्वेषकामवान्॥ 12-194-21(72706)
अरागमोहो निर्द्वन्द्वो न शोचति न सज्जते।
न कर्ता करणीयानां नाकार्याणामिति स्थितिः॥ 12-194-22(72707)
न चाहंकारयोगेन मनः प्रस्थाफ्येत्क्वचित्।
न चार्थग्रहणे युक्तो नावमानी न चाक्रियः॥ 12-194-23(72708)
ध्यानक्रियापरो युक्तो ध्यानवान्ध्याननिश्चयः।
ध्याने समाधिमुत्पाद्य तदपि त्यजति क्रमात्॥ 12-194-24(72709)
स वै तस्यामवस्थायां सर्वत्यागकृतः सुखी।
निरिच्छस्त्यजति प्राणान्ब्राह्मीं संश्रयते तनुम्॥ 12-194-25(72710)
`निरालम्बो भवेत्स्मृत्वा मरणाय समाधिमान्।
सर्वाल्लोँकान्समाक्रम्य क्रमात्प्राप्नोति वै परम्॥' 12-194-26(72711)
अथवा नेच्छते तत्र ब्रह्मकायनिषेवणम्।
उत्क्रामति च मार्गस्थो नैव क्वचन जायते॥ 12-194-27(72712)
आत्मबुद्धिं समास्थाय शान्तीभूतो निरामयः।
अमृतं विरजाः शुद्धमात्मानं प्रतिपद्यते॥ ॥ 12-194-28(72713)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 194॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-194-2 ब्रह्मयुक्ता महामते इति ड. थ. पाठः॥ 12-194-7 शान्तिर्ब्रह्मण्यवस्थिता इति ट. ड. थ. पाठः॥ 12-194-13 यथा निवर्तते कर्मेति झ. ध. पाठः॥ 12-194-17 कुशहस्तः कुशस्थलीति ट. ड. थ. पाठः॥ 12-194-18 विषयेभ्यो मनो रुन्ध्यादिति ट. पाठः॥ 12-194-19 ब्रह्म च ध्यायते योगी जपन्वै वेदसंहितामिति ड. थ. पाठः॥


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